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एक मुसलमान हजर-ए-असवद (काले पत्थर) की अगर इबादत नहीं करता, तो उसे चूमता क्यों है?

उदाहरण के लिए, क्या हम किसी को अपने पिता के पत्र वाले लिफाफे को चूमने के लिए दोषी ठहराते हैं? हज के सभी काम अल्लाह के ज़िक्र को स्थापित करने के लिए एवं सारे संसार के रब की आज्ञाकारिता और उसके आगे समर्पण के प्रमाण के तौर पर हैं। इनसे पत्थर या किसी स्थान या व्यक्तियों की इबादत उद्देश्य नहीं है। जबकि, इस्लाम एक अल्लाह की इबादत का आह्वान करता है, जो आकाशों और धरती और उनके बीच जो कुछ है, सबका स्वामी है, हर चीज का सृष्टिकर्ता और हर वस्तु का मालिक है।

''मैंने तो अपना मुख एकाग्र होकर, उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों तथा धरती की रचना की है और मैं मुश्रिकों में से नहीं हूँ।'' [302] [सूरा अल-अनआम : 80]

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