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क्या धर्म की ओर पलटना विवेक तथा सोचने समझने की शक्ति को निष्क्रिय कर देता है?

अक़्ल की भूमिका चीज़ों को आंकने और उनको प्रमाणित करने की है। अतः इंसान के अस्तित्व के उद्देश्य तक अक़्ल का पहुँच न पाना, उसकी भूमिका का ख़त्म हो जाना नहीं है, बल्कि धर्म को यह अवसर प्रदान करना है कि वह इन्सान को वह बात समझाए, जो अक़्ल समझ नहीं पाई। धर्म इंसान को उसके सृष्टिकर्ता के बारे, उसके अस्तित्व के स्रोत एवं उसके उद्देश्य के बारे में बताता है। तब अक़्ल इन बातों को समझने का प्रयास करती है, इनका मूल्यांकन करती है एवं इनकी पुष्टि करती है। इस तरह सृष्टिकर्ता के वजूद को मान लेने से विवेक तथा तर्क निष्क्रिय नहीं हुआ।

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