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मूल पाप के बारे में इस्लाम की क्या राय है?

मानव पिता आदम -अलैहिस्सलाम- के वर्जित पेड़ से खा लेने के कारण, उनकी तौबा स्वीकार करने के समय अल्लाह ने जो मानव को पाठ पढ़ाया, वह सारे संसारों के रब के द्वारा मानव को क्षमा करने का पहला उदाहरण था। चूँकि आदम से विरासत में मिले पाप का कोई अर्थ नहीं है, जैसा कि ईसाइ मानते हैं, इसलिए कोई किसी के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा। हर व्यक्ति अपने गुनाह का बोझ अकेला उठाएगा। यह हमपर अल्लाह की एक दया है कि इंसान गुनाहों से पाक-साफ़ होकर पैदा होता है और वह वयस्क होने के बाद से ही अपने कर्मों का स्वयं ज़िम्मेदार है।

इंसान से उस गुनाह का हिसाब ही नहीं लिया जाएगा, जिसको उसने किया ही नहीं। इसी प्रकार वह अपने ईमान एवं अच्छे कार्य के कारण ही मुक्ति पाएगा। अल्लाह ने इंसान को जीवन दिया तथा उसे आज़माने एवं उसकी परीक्षा लेने के लिए उसे इरादा दिया। वह केवल अपने कर्मों का ज़िम्मेवार है।

अल्लाह तआला ने कहा है :

''कोई किसी का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम्हें अपने रब की ओर लौटना है, जो तुम्हें तुम्हारे कर्मों के बारे में बता देगा। वह दिलों के भेद को जानता है।'' [176] [सूरा अल-जुमर : 7]

ओल्ड टेस्टामेंट में आया है :

''औलाद के बदले बापों को नहीं मारा जाएगा, और बापों के बदले औलाद को नहीं मारा जाएगा। हर इंसान का उसके अपने गुनाह के बदले वध किया जाएगा।'' [177] [Book of Deuteronomy : 24:16]

जिस तरह क्षमा न्याय के साथ असंगत नहीं है, वैसे ही न्याय क्षमा और दया को रोकता नहीं है।

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