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ඉස්ලාමය පැවැත්මේ සම්භවය පිළිබඳ න්යායන් එක් නිවැරදි සත්යයක පැවැත්මේ අනිවාර්යය භාවය තුළට සීමා කරන්නේ ඇයි?

लोगों के बीच विभिन्न सिद्धांतों और विश्वासों के पाए जाने का मतलब यह नहीं है कि एक सच्चे सत्य का अस्तित्व नहीं है। उदाहरण के तौर पर एक काली कार के मालिक द्वारा उपयोग किए जाने वाले यातायात के साधन के बारे में लोगों की अवधारणाएं और कल्पनाएं चाहे कितनी ही क्यों न हों, इस बात का इनकार नहीं किया जा सकता कि उसके पास एक काली कार है। अब अगर पूरी दुनिया माने कि इस व्यक्ति की कार लाल है, तो यह विश्वास इसे लाल नहीं बनाता है। केवल एक ही सच्चाई है और वह यह है कि यह एक काली कार है।

उसी प्रकार किसी चीज़ की वास्तविकता के बारे में अवधारणाओं और कल्पनाओं की बहुलता इस चीज़ के लिए एक निश्चित वास्तविकता के अस्तित्व को नकारती नहीं है।

अस्तित्व की उत्पत्ति के बारे में लोगों की जितनी भी धारणाएं और कल्पनाएं हों, यह इस सत्य के अस्तित्व को नकारती नहीं हैं कि वह एक अकेला सृष्टिकर्ता है, उसका कोई आकार नहीं है जिसे मानव जानता हो, न उसका कोई साझी है और न ही कोई संतान। उदाहरण के तौर पर अगर पूरी दुनिया यह मान ले कि सृष्टिकर्ता जानवर या इंसान के रूप में अवतरित होता है, तो वह ऐसा नहीं हो जाएगा। अल्लाह तआला इन सब चीज़ों से पाक एवं उच्च है।

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