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मनुष्य के लिए धर्म को प्रायोगिक विज्ञान से बदल लेना क्यों सही नहीं है?

आज (ब्रह्मांड के एक निर्माता के अस्तित्व के) कई खंडनकर्ता मानते हैं कि प्रकाश को समय में सीमित नहीं किया जा सकता है। लेकिन वे इस बात को स्वीकार नहीं करते कि सृष्टिकर्ता समय और स्थान के नियम के अधीन नहीं है। अर्थात् सृष्टिकर्ता हर चीज़ से पहले और हर चीज़ के बाद है, वह उच्च है और कोई भी सृष्टि उसे अपने घेरे में नहीं ले सकती।

आज बहुत-से लोगों का मानना है कि जुड़े हुए अणु जब अलग होते हैं, तो एक-दूसरे के साथ संवाद भी करते रहते हैं, परन्तु इस विचार को स्वीकार नहीं करते कि सृष्टिकर्ता अपने ज्ञान के द्वारा अपने बन्दे के साथ होता है, बंदा जहाँ भी जाए। वे अक़्ल को देखे बिना उसपर विश्वास रखते हैं, परन्तु अल्लाह को देखे बिना उसपर विश्वास रखने से इंकार कर देते हैं।

बहुत-से लोग जन्नत एवं जहन्नम पर ईमान रखने से इंकार करते हैं और बहुत-सी दूसरी दुनियाओं को उन्हें देखे बिना मान लेते हैं। उन्हें भौतिक विज्ञान ने उन चीजों पर विश्वास करने के लिए कहा, जो अस्तित्व में भी नहीं हैं। उदाहरण स्वरूप मृचिका को ले लीचिए। उन्होंने उसे मान भी लिया और स्वीकार भी कर लिया। जबकि मृत्यु के समय, न तो भौतिकी से मनुष्यों को कोई लाभ होगा और न ही रसायन विज्ञान से। क्योंकि इन विज्ञानों ने उनसे अनस्तित्व का वादा किया है।

कोई व्यक्ति केवल इसलिए लेखक का इंकार नहीं कर सकता है कि उसने पुस्तक को जान लिया है। वे विकल्प नहीं हैं। विज्ञान ने ब्रह्मांड के नियमों की खोज की है, लेकिन उन्हें स्थापित नहीं किया है, बल्कि सृष्टिकर्ता ने उन्हें स्थापित किया है।

मोमिनों में से बहुत-से लोग भौतिकी और रसायन विज्ञान के उच्च श्रेणी में बैठे हुए हैं, मगर वे जानते हैं कि ब्रह्मांडीय क़ानूनों के पीछे महान सृष्टिकर्ता है। भौतिक विज्ञान ने, जिसपर भौतिकवादी लोग विश्वास रखते हैं, उन क़ानूनों की खोज की है, जिन्हें अल्लाह ने स्थापित किया है, विज्ञान ने इन क़ानूनों को पैदा नहीं किया है। वैज्ञानिकों को अल्लाह द्वारा ईजाद किए हुए इन क़ानूनों के बिना अध्यन करने के लिए कुछ भी नहीं मिलेगा, जबकि ईमान मोमिन को दुनिया व आख़िरत दोनों स्थानों में लाभ पहुँचाता है और यह होगा ब्रह्मांडीय क़ानूनों को सीख कर, जिससे सृष्टिकर्ता पर उनका ईमान और बढ़ जाता है।

जब किसी व्यक्ति को गंभीर फ्लू या तेज बुखार होता है, तो वह पीने के लिए कभी-कभी एक ग्लास पानी तक नहीं ले पाता, तो वह अपने सृष्टिकर्ता के साथ अपने रिश्ते की कैसे अनदेखी कर सकता है?

विज्ञान हमेशा बदलता रहता है। केवल विज्ञान पर पूर्ण ईमान अपने आप में एक समस्या है। क्योंकि नई खोजों के उद्भव पिछले सिद्धांतों को रद्द कर देता है। कुछ चीज़ें जिन्हें हम विज्ञान समझते हैं, वह अभी तक सिद्धांत हैं। यहाँ तक कि यदि हम मान लें कि विज्ञान के द्वारा खोजी हुई चीजें सिद्ध और सटीक हैं, उसके बाद भी एक समस्या बाक़ी रह जाती है। समस्या यह है कि वर्तमान में विज्ञान खोजकर्ता को सारा महत्व देता है और निर्माता की उपेक्षा करता है। उदाहरण स्वरूप, हम मान लें कि एक व्यक्ति एक कमरे में प्रवेश करता है और वह एक सुन्दर एवं बहुत महारत से बनाई गई पेंटिंग की खोज करता है, फिर वह कमरे से बाहर निकलता है और लोगों को इस खोज के बारे बताता है। सभी लोग उस आदमी की प्रशंसा करने लगते हैं, जिसने उस पेंटिंग को ढ़ूंढ़ निकाला और जो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है, उसे भूल जाते हैं कि ''किसने इसे पेंट किया?'' आज लोग यही कर रहे हैं। वे प्रकृति और अंतरिक्ष के नियमों की वैज्ञानिक खोजों की बहुत प्रशंसा करते हैं और इन कानूनों को बनाने वाले की रचनात्मकता को भूल जाते हैं।

भौतिक विज्ञान से मनुष्य मिसाइल बना सकता है, परन्तु इस विज्ञान से वह चित्र की सुन्दरता का आंकलन नहीं कर सकता, न वस्तुओं के मूल्य निर्धारित कर सकता है, न ही वह हमें अच्छाई और बुराई के बारे में बता सकता है। भौतिक विज्ञान से हम यह तो जान सकते हैं कि गोली जान लेती है, लेकिन हम यह नहीं जान सकते कि इसका इस्तेमाल दूसरों की जान लेने के लिए करना ग़लत है।

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है : "विज्ञान नैतिकता का स्रोत नहीं हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि विज्ञान के नैतिक आधार हैं। लेकिन हम नैतिकता की वैज्ञानिक नींव के बारे में बात नहीं कर सकते। नैतिकता को विज्ञान के नियमों और समीकरणों के अधीन करने के सभी प्रयास विफल रहे हैं और विफल रहेंगे।"

प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट कहते हैं : "अल्लाह के अस्तित्व का नैतिक प्रमाण न्याय के अनुसार है। क्योंकि यह अनिवार्य है कि अच्छे आदमी को पुरस्कृत किया जाए तथा बुरे आदमी को दंडित किया जाए। जबकि यह केवल एक उच्च स्रोत की उपस्थिति में हो सकता है, जो प्रत्येक मानव को उसके द्वारा किए गए कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराए। उसी प्रकार (उपर्युक्त नैतिक) प्रमाण पुण्य एवं सफलता को जमा करने की संभावना के तकाज़ा पर स्थापित है। क्योंकि यह एक अलौकिक अस्तित्व के साये ही में हो सकता है, जो हर चीज़ का जानने वाला हो एवं हर चीज़ पर संप्रभुता रखता हो। इसी उच्च स्रोत एवं अलौकिक अस्तित्व का नाम माबूद (पूज्य) है।"

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