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सृष्टिकर्ता ने इन्सान को पैदा होने या न होने का एख़्तियार क्यों नहीं दिया?

यदि अल्लाह सृष्टि को अस्तित्व में आने या न आने का एख़्तियार देता, तो इसके लिए ज़रूरी होता सृष्टि का वजूद पहले से रहा हो। क्योंकि बिना अस्तित्व के मानव की कोई राय ही कैसे हो सकती है? यहाँ सवाल अस्तित्व में होने या न होने का है। इंसान का जीवन के साथ जुड़ा होना एवं उसे खोने का डर उसका इस नेमत से राज़ी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।

ज़िन्दगी की नेमत मानव के लिए एक परीक्षा है, ताकि अच्छे इनसान जो अपने रब से राज़ी हों एवं बुरे इंसान जो अपने रब से नाराज़ हों, दोनों के बीच अंतर किया जा सके। अतः मानव की रचना से अल्लाह का उद्देश्य है उससे राज़ी रहने वालों को अलग करना, ताकि उन्हें आख़िरत में अल्लाह का सम्मानीय घर प्राप्त हो।

यह सवाल दरअसल इस बात का प्रमाण है कि जब संदेह दिमाग़ों में घर कर जाए, तो सोच व विचार ख़त्म हो जाता है और यह क़ुरआन के चमत्कार होने का एक प्रमाण है।

खुद अल्लाह ताआला का फ़रमान है :

''मैं अपनी आयतों (निशानियों) से उन लोगों को फेर दूँगा, जो धरती में नाहक़ बड़े बनते हैं। और यदि वे प्रत्येक निशानी देख लें, तब भी उसपर ईमान नहीं लाते। और यदि वे भलाई का मार्ग देख लें, तो उसे मार्ग नहीं बनाते और यदि गुमराही का मार्ग देखें, तो उसे मार्ग बना लेते हैं। यह इस कारण कि उन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठलाया और वे उनसे ग़ाफ़िल थे।'' [40] इसलिए यह मानना सही नहीं है कि इन्सान की रचना से अल्लाह का जो उद्देश्य है, उसे जानना हमारा अधिकार है और हम उसका मुतालबा कर सकते हैं। अतः उसे हमसे छुपा लेना भी हम परकोई ज़ुल्म नहीं है।

[सूरा अल-आराफ़ : 146]

जब अल्लाह हमें हमेशा रहने वाला जीवन प्रदान करेगा और ऐसी नेमत एवं जन्नत में रखेगा जिसके बारे में न किसी कान ने सुना होगा, न जिसे किसी आँख ने देखा होगा और न किसी इन्सान के दिल में उसका ख़्याल आया होगा, तो इसमें क्या ज़ुल्म है?

वह हमें आज़ाद इच्छा प्रदान करता है, ताकि हम खुद निर्णय लें कि हमें उस नेमत को चुनना है या इस यातना को।

अल्लाह हमें उस चीज़ के बारे में बताता है, जो हमारी प्रतीक्षा कर रही है। हमारे सामने एक स्पष्ट रणनीति प्रस्तुत करता है, ताकि हम उस नेमत तक पहुँच सकें और अज़ाब से बच सकें।

अल्लाह हमें विभिन्न तरीक़ों एवं पद्धतियों से उस जन्नत के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है और बार-बार हमें जहन्नम के मार्ग पर चलने से सावधान करता है।

अल्लाह हमें जन्नत वालों की कहानियाँ सुनाता है कि कैसे उन्होंने इसे प्राप्त किया और जहन्नम वालों के क़िस़्स़े सुनाता है कि कैसे वे अज़ाब तक पहुँचे, ताकि हम इससे सबक़ हासिल करें।

इसी तरह वह जन्नत वालों तथा जहन्नम वालों के बीच होने वाली बातचीत को बयान करता है, ताकि हम सब कुछ अच्छी तरह समझ जाएँ।

अल्लाह हमारी नेकी को दस गुना बढ़ा देता है और गुनाह को एक ही गुनाह गिनता है और इसके बारे हमें भी बताता है, ताकि हम नेकी के कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लें।

अल्लाह हमें बताता है कि यदि हम बरे कार्य के बाद अच्छा कार्य करें, तो हमारे गुनाह मिट जाते हैं। इस प्रकार हम दस नेकियाँ कमाते हैं, तो हमारे दस गुनाह मिटा दिए जाते हैं।

वह हमें बताता है कि तौबा पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है। गुनाह से तौबा करने वाला ऐसा हो जाता है, जैसे उसका कोई गुनाह ही न हो।

अल्लाह भलाई का रास्ता दिखाने वाले को भला करने वाले के ही तरह मानता है।

अल्लाह नेकि कमाने के रास्तों को आसान बनाता है। हम क्षमायाचना, तसबीह एवं अज़कार के द्वारा बड़े पुण्य कमा सकते हैं और बिना किसी परेशानी के अपने गुनाहों से छुटकारा पा सकते हैं।

वह क़ुरआन का हर अक्षर पढ़ने के बदले में हमारे लिए दस नेकियाँ लिखता है।

वह हमारे केवल भला काम करने की नीयत करने के बदले में नेकी लिख देता है, यद्यपि उसके बाद हम उसे कर न सकें। परन्तु बुरे काम की नीयत के बदले में हमें दंडित नहीं करता, जब तक कि बुरा काम हमसे हो न जाए।

अल्लाह हमसे वादा करता है कि यदि हम भलाई के काम में अग्रगामी रहें, तो वह हमें अधिक सुपथ दिखाएगा, हमें शक्ति प्रदान करेगा एवं हमारे लिए भलाई के रास्ते आसान कर देगा।

इसमें कौन-सा अत्याचार है?

वास्तव में, अल्लाह हमारे साथ केवल न्याय का मामला नहीं करता, बल्कि वह हमारे साथ रहमत, उदारता एवं एहसान का मामला भी करता है।

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