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मृत्यु के बाद दोबारा जीवित होकर उठने का क्या प्रमाण है?

अस्तित्व और घटनाओं के दृष्टांत, सभी इस बात को इंगित करते हैं कि जीवन में हमेशा निर्माण और पुनर्निर्माण का काम चलता रहता है। इसके बहुत सारे उदाहरण हैं, जैसा कि धरती की मृत्यु के बाद बारिश के द्वारा उसे दोबारा जीवित किया जाना इत्यादि।

''वह जीवित को मृत से निकालता है तथा मृत को जीवित से निकालता है और धरती को उसके मृत हो जाने के बाद जीवित करता है। और इसी प्रकार, तुम (भी) निकाले जाओगे।'' [79] मरने के बाद जीवित होकर उठने का और एक प्रमाण ब्रह्मांड की मज़बूत व्यवस्था है, जिसमें कोई खराबी नहीं है। यहाँ तक कि परमाणु में मौजूद एक असीम रूप से छोटा इलेक्ट्रॉन भी एक कक्षा से दूसरी कक्षा में तब तक नहीं जा सकता, जब तक कि वह अपनी गति के बराबर ऊर्जा नहीं देता या नहीं लेता। आप इस प्रणाली में कैसे कल्पना कर सकते हैं कि रोई हत्यारा या उत्पीड़क सारे संसार के रब द्वारा हिसाब-किताब लिए जाने या दंडित किए बिना भाग सकेगा?

[सूरा अल-रूम : 19]

"क्या तुम यह समझ बैठे हो कि हमने तुम्हें बेकार ही पैदा किया है और यह कि तुम हमारी ओर लौटाए ही नहीं जाओगे। तो सर्वोच्च है अल्लाह वास्तविक अधिपति। नहीं है कोई सच्चा पूज्य, परन्तु वही महिमावान अर्श (सिंहासन) का स्वामी।'' [80] तथा अल्लाह ने आकाशों और धरती को हक़ के साथ पैदा किया और ताकि हर व्यक्ति को उसका बदला दिया जाए जो उसने कमाया तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा।'' [81]

[सूरा अल-मोमिनून : 115,116] ''या वे लोग जिन्होंने बुराइयाँ की हैं, यह समझ रखा है कि हम उन्हें उन लोगों जैसा कर देंगे, जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए? उनका जीना और उनका मरना समान होगा? बहुत बुरा है, जो वे निर्णय कर रहे हैं। [सूरा अल-जास़िया : 21, 22]

क्या हम यह नहीं देखते कि इस जीवन में हम अपने कई रिश्तेदारों और दोस्तों को खो देते हैं और जानते हैं कि हम एक दिन उन ही की तरह मर जाएंगे। लेकिन हमारे दिल की गहराई में यह एहसास होता है कि हम हमेशा जीवित रहेंगे। यदि मानव शरीर भौतिक नियमों के भीतर और भौतिक जीवन के ढांचे के भीतर भौतिक होता तथा उसमें ऐसी कोई आत्मा न होती, जिसे दोबारा उठाया जाए और जवाबदेह ठहराया जाए, तो स्वतंत्रता की इस स्वभाविक भावना का कोई अर्थ न होता। आत्मा समय से ऊपर होती है और मौत को पीछे छोड़ देती है।

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