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प्रश्न 37: रोज़ा की परिभाषा क्या है?

उत्तर- रोज़ा अल्लाह की इबादत की निय्यत (इरादा) से फ़ज्र प्रकट होने के समय से सुर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से बचे रहने का नाम है। यह दो प्रकार का होता है।

फ़र्ज़ रोज़ा: जैसे कि रमज़ान महीने का रोज़ा, यह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है।

अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ) ''ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं, जैसा कि तुम से पहले के लोगों पर अनिवार्य किये गए थे, आशा है कि तुम संयमी एवं धर्मपरायण बन जाओ''। [सूरा अल-बक़रा: 183]

गैर वाजिब रोज़ाः जैसे कि हर हफ़्ते के सोमवार एवं बृहस्पतिवार के रोज़े, हर महीने में तीन दिन के रोज़े, इस में सर्वोत्तम है चंद्र-मास के बीच के दिनों के अय्याम-ए-बीज़ (13, 14, 15 तारीख़) के तीन दिन के रोज़े।